Archive for February, 2015

सूरज से आँख मिलता हूँ
चंदा को रोज सुलाता हूँ
तारों को राह दिखाता हूँ
अँधेरे से जब डरता साया
अपने आगोश में लेता हूँ
ख़ामोशी का शोर बढे जब
भीड़ में छुप जाता हूँ
मुट्ठी से फिसले रेत से सपने
आँखों में कैसे रखूँ  इनको
इतने सारे चुभते सपने
लहरों पे लिखता अपनी बातें
रेत में सनजोता हूँ
हर मुस्कान में दर्द छुपा के
अपने सारे दर्द मिटाता
जब सारे अपने पीछे  छूटे
हमसफ़र अब पैरों के छालों
रहगुज़र दर रहगुजर
मंजिल हर एक  मील का  पत्थर
हर मंजिल एक मील का पत्थर
एक अंतहीन सफर में हूँ मैं
यायावर मैं ……..
हर  अंत को शुरुआत बनाता…